
निर्वृत्तिर्यत्र सावद्यात् प्रवृत्तिः शुभकर्मसु ।
त्रयोदशप्रकारं तच्चारित्रं व्यवहारतः ॥14॥
सावद्य से नित निवृत्ति, शुभ कर्म वर्तन त्रयोदश ।
विध सच्चरित्र व्यवहार से, सब जान लो जिनवर कथित ॥१४॥
अन्वयार्थ : जहाँ पर सावद्य हिंसा के कारणरूप पदार्थों से निवृत्ति और शुभ कार्य में प्रवृत्ति हो, उसे व्यवहार-चारित्र कहते हैं और वह तेरह प्रकार का है ।