+ उत्तम-चारित्र की पात्रता -
संगं मुक्त्वा जिनाकारं धृत्वा साम्यं दृशं धियं ।
यः स्मरेत् शुद्धचिद्रूपं वृत्तं तस्य किलोत्तमं ॥16॥
लो सकल परिग्रह छोड़, जिन मुद्रा दरश-धी साम्य को ।
धर शुद्ध चिद्रूप ध्यान करता, परम चारित्र उसी को ॥१६॥
अन्वयार्थ : (बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के) परिग्रहों का सर्वथा त्यागकर; जिन-मुद्रा / नग्न-मुद्रा, समता, सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का धारक होकर जो शुद्ध-चिद्रूप का स्मरण करता है, उसी को उत्तम चारित्र होता है ॥१६॥