+ परम चारित्र की परिभाषा -
शुद्ध स्वे चित्स्वरूपे या स्थितिरत्यंतनिश्चला ।
तच्चारित्रं परं विद्धि निश्चयात् कर्मनाशकृत् ॥18॥
निज शुद्ध चिन्मयरूप में, अत्यन्त निश्चल स्थिति ।
परमार्थ से है कर्म नाशक, जान श्रेष्ठ चारित्र ही ॥१८॥
अन्वयार्थ : आत्मिक शुद्ध-स्वरूप में जो निश्चलरूप से स्थिति है, उसे निश्चय-नय से श्रेष्ठ चारित्र व कर्म-नाश करना, तुम जानो ॥१८॥