
रत्नत्रयं परं ज्ञेयं व्यवहारं च निश्चयं ।
निदानं शुद्धचिद्रूपस्वरूपात्मोपलब्धये ॥21॥
निज शुद्ध चिद्रूप आत्मा की, प्राप्ति-हेतु श्रेष्ठतम ।
कारण कहा व्यवहार निश्चय, रत्नत्रय अब ग्रहो यह ॥२१॥
अन्वयार्थ : यह व्यवहार और निश्चय - दोनों प्रकार का रत्नत्रय शुद्ध-चिद्रूप के स्वरूप की प्राप्ति में असाधारण कारण है ॥२१॥