स्वशुद्धचिद्रूपपरोपलब्धि कस्यापि रत्नत्रयमंतरेण ।
क्वचित्कदाचिन्न च निश्चयो दृढोऽस्ति चित्ते मम सर्वदैव ॥22॥
इस रत्नत्रय के विना, शुद्ध चिद्रूप उपलब्धि कभी ।
कैसे कहीं किसको हुई है नहीं हूँ दृढ़ निश्चयी ॥२२॥
अन्वयार्थ : इस शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति, विना रत्नत्रय के आज तक कभी और किसी देश में नहीं हुई । सबको रत्नत्रय की प्राप्ति के अनन्तर ही शुद्ध-चिद्रूप का लाभ हुआ है, यह मेरे आत्मा में दृढ़रूप से निश्चय है ॥२२॥