+ विशुद्धता सर्वत्र प्रशंसनीय है -
विशुद्धं वसनं श्लाघ्यं रत्नं रूप्यं च कांचनं ।
भाजनं भवनं सर्वैर्यथा चिद्रूपकं तथा ॥1॥
ज्यों वस्त्र निर्मल रत्न चाँदी, स्वर्ण बर्तन गृहादि ।
उत्तम प्रशंसा-योग्य त्यों, चिद्रूप निज सर्वोपरि ॥१३.१॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार निर्मल वस्त्र, रत्न, चाँदी, सोना, पात्र, भवन आदि पदार्थ उत्तम और प्रशंस्य गिने जाते हैं; उसी प्रकार यह शुद्ध-चिद्रूप भी अति उत्तम और प्रशंस्य है ।