
रागादिलक्षणः पुंसि संक्लेशोऽशुद्धता मता ।
तन्नाशो येन चांशेन तेनांशेन विशुद्धता ॥2॥
है जीव में रागादि लक्षण, अशुद्धि संक्लेशता ।
वह नष्ट जितनी हो, उसी अनुसार है सुविशुद्धता ॥१३.२॥
अन्वयार्थ : पुरुष में राग-द्वेष आदि लक्षण का धारण संक्लेश, अशुद्धपना कहा जाता है और जितने अंश में राग-द्वेष आदि का नाश हो जाता है, उतने अंश में विशुद्धपना कहा जाता है ।