
येनोपायेन संक्लेशश्चिद्रूपाद्याति वेगतः ।
विशुद्धिरेति चिद्रूपे स विधेयो मुमुक्षुणा ॥3॥
जिस विधि से अति तीव्रता से नष्ट हो संक्लेशता ।
बड़ती विशुद्धि आत्मा में, मुमुक्षु वह कर सदा ॥१३.३॥
अन्वयार्थ : जो जीव मोक्षाभिलाषी हैं, अपने आत्मा को समस्त कर्मों से रहित करना चाहते हैं; उन्हें चाहिए कि जिस उपाय से यह संक्लेश दूर हो विशुद्धपना आए, वह उपाय अवश्य करें ।