+ शुद्धि के साधन -
सत्पूज्यानां स्तुतिनतियजनं षट्कर्मावश्यकानां
वृत्तादीनां दृढतरधरणं सत्तपस्तीर्थयात्रा ।
संगादीनां त्यजनमजननं क्रोधमानादिकाना –
माप्तैरुक्तं वरतरकृपया सर्वमेतद्धि शुद्धयै ॥4॥
सत् पूज्य की स्तुति पूजन, नमन आवश्यक करम ।
नित छह व्रतादि धरे दृढ़ता से सुतप सब परिग्रह ॥
का त्याग यात्रा तीर्थ की, नहिं व्यक्तता क्रोधादि की ।
ये सब विशुद्धि के लिए, जिनवर कहें करणीय ही ॥१३.४॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष उत्तम और पूज्य हैं, उनकी स्तुति, नमस्कार और पूजन करना; सामायिक, प्रतिक्रमण आदि छह प्रकार के आवश्यकों का आचरण करना; सम्यक्चारित्र को दृढ़रूप से धारण करना; उत्तम तप और तीर्थ-यात्रा करना, बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रहों का त्याग करना; क्रोध, मान, माया आदि कषायों को उत्पन्न न होने देना आदि विशुद्धि के कारण हैं; इन बातों का आचरण किए विना विशुद्धि नहीं हो सकती ।