
रागादिविक्रियां दृष्टवांगिनां क्षोभादि मा व्रज ।
भवे तदितरं किं स्यात् स्वच्छं शिवपदं स्मर ॥5॥
रागादि विकृति देख अज्ञों की नहीं क्षोभादि कर ।
इसके अलावा क्या यहाँ? यों स्वच्छ शिव-पद याद कर ॥१३.५॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! मनुष्यों में राग-द्वेष आदि का विकार देख तुझे किसी प्रकार क्षोभ नहीं करना चाहिए; क्योंकि संसार में सिवाय राग आदि विकार के और होना ही क्या है? इसलिए तुम अतिशय विशुद्ध मोक्ष-मार्ग का ही स्मरण करो ।