+ विशुद्धता-प्राप्ति की पात्रता -
विपर्यस्तो मोहादहमिह विवेकेन रहितः
सरोगो निःस्वो वा विमतिरगुणः शक्तिविकलः ॥
सदा दोषी निंद्योऽगुरुविधिरकर्मा हि वचनं
वदन्नंगी सोऽयं भवति भुवि वैशुद्धयसुखभाग् ॥6॥
मैं मोह से मिथ्यात्वमय हो, सरोगी निर्धन कुधी ।
अविवेकि दोषी अवगुणी, शक्ति रहित नित आलसी ॥
नित हीन आचरणी इत्यादि, भावना भाए सदा ।
वह विशुद्धि से व्यक्त सुख को भोगता चिद्रूपता ॥१३.६॥
अन्वयार्थ : मैं मोह के कारण विपर्यस्त होकर ही अपने को विवेक-हीन, रोगी, निर्धन, मति-हीन, अगुणी, शक्ति-रहित, दोषी, निन्दनीय, हीन-क्रिया का करनेवाला, अकर्मण्य / आलसी मानता हूँ । इस प्रकार वचन बोलनेवाला (ऐसी भावना करनेवाला) विशुद्धता के सुख का अनुभव करता है ।