+ गृहस्थों को आत्मोपलब्धि की दुर्लभता -
राज्ञो ज्ञातेश्च दस्योर्ज्वलनजलरिपोरीतितो मृत्युरोगात्
दोषोद्भूतेरकीर्त्तेः सततमतिभयं रैनृगोमंदिरस्य ।
चिंता तन्नाशशोको भवति च गृहीणां तेन तेषां विशुद्धं
चिद्रूपध्यानरत्नं श्रुतिजलधिभवं प्रायशो दुर्लभंस्यात् ॥7॥
राजा अनल जल रिपु मृत्यु, ईति जाति उपद्रव ।
दोषों से फैले अयश, इत्यादि अति भय है सतत ॥
धन नर पशु गृह आदि चिन्ता, नाश में शोकादि भी ।
इस अज्ञ को श्रुत-जलधि जन्मा, शुद्ध चिद्रूप कठिन ही ॥१३.७॥
अन्वयार्थ : संसारी जीवों को राजा, जाति, चोर, अग्नि, जल, बैरी, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि ईति, मृत्यु, रोग, दोष और अकीर्ति से सदा भय बना रहता है । धन, कुटुम्बी, मनुष्य, पशु और मकान की चिन्ताएं लगी रहती हैं एवं उनके नाश से शोक होता रहता है; इसलिए उन्हें शास्त्ररूपी अगाध समुद्र से उत्पन्न, शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान की प्राप्ति होना नितान्त दुर्लभ है ।