+ विशुद्धि के लिए हेय का प्ररूपण -
पठने गमने संगे चेतनेऽचेतनेऽपि च ।
किंचित्कार्यकृतौ पुंसा चिंता हेया विशुद्धये ॥8॥
पढ़ने गमन चेतन अचेतन, संग करते कार्य में ।
चिन्ता तजो आतम विशुद्धि-हेतु चेतन चाहते ॥१३.८॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव विशुद्धता का आकांक्षी है, अपने आत्मा को निष्कलंक बनाना चाहता है, उसे चाहिए कि वह पढ़ने, गमन करने, चेतन-अचेतन दोनों प्रकार के परिग्रह धारने और किसी अन्य कार्य के करने में किसी प्रकार की चिन्ता न करे अर्थात् अन्य पदार्थों की चिन्ता करने से आत्मा विशुद्ध नहीं बन सकता ।