+ आत्मोपलब्धि की महानता -
शुद्धचिद्रूपकस्यांशो द्वादशांगश्रुतार्णवः ।
शुद्धचिद्रूपके लब्धे तेन किं मे प्रयोजनं ॥9॥
है शुद्ध चिद्रूप अंश, सब द्वादशांग श्रुतसागर कहा ।
यों शुद्ध चिद्रूप पा लिया, तो सभी कुछ ही पा लिया ॥१३.९॥
अन्वयार्थ : आचारांग, सूत्रकृतांग आदि द्वादशांगरूपी समुद्र शुद्ध-चिद्रूप का अंश है; इसलिए यदि शुद्ध-चिद्रूप प्राप्त हो गया है, तो मुझे द्वादशांग से क्या प्रयोजन? वह तो प्राप्त हो ही गया ।