
शुद्धचिद्रूपके लब्धे कर्तव्यं किंचिदस्ति न ।
अन्यकार्यकृतौ चिंता वृथा मे मोहसंभवा ॥10॥
निज शुद्ध चिद्रूप प्राप्ति पर, कर्तव्य कुछ रहता नहीं ।
हो मोह से उत्पन्न कुछ, करने की चिन्ता व्यर्थ ही ॥१३.१०॥
अन्वयार्थ : मुझे संसार में शुद्ध-चिद्रूप का लाभ हो गया है; इसलिए मुझे करने के लिए कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहा; सब कर चुका तथा शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति हो जाने पर अन्य कार्यों के लिए मुझे चिन्ता करना भी व्यर्थ है; क्योंकि यह मोह से होती है अर्थात् मोह से उत्पन्न हुई चिन्ता से मेरा कदापि कल्याण नहीं हो सकता ।