+ सदा सुखी रहने का उपाय -
संक्लेशस्य विशुद्धेश्च फ लं ज्ञात्वा परीक्षणं ।
तं त्यतेत्तां भजत्यंगी योऽत्रामुत्र सुखी स हि ॥13॥
जो संक्लेश विशुद्धि का फल, परीक्षा से जान वह ।
छोड़े सदा सेवे यहाँ, पर-लोक में भी सुखी नित ॥१३.१३॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष संक्लेश और विशुद्धि के फल को परीक्षा पूर्वक जानकर संक्लेश को छोड़ता है और विशुद्धि का सेवन करता है; उस मनुष्य को इस-लोक, पर-लोक दोनों लोकों में सुख मिलता है ।