
संक्लेशे कर्मणां बंधोऽशुभानां दुःखदायिनां ।
विशुद्धौ मोचनं तेषां बंधो वा शुभकर्मणां ॥14॥
हो अशुभ दुखदाई कर्म का बन्ध नित संक्लेश से ।
छूटे अशुभ शुभ कर्म का हो बन्ध सदा विशुद्धि से ॥१३.१४॥
अन्वयार्थ : क्योंकि संक्लेश के होने से अत्यन्त दु:ख-दाई अशुभ कर्मों का आत्मा के साथ सम्बन्ध होता है और विशुद्धता की प्राप्ति से इन अशुभ कर्मों का सम्बन्ध छूटता है तथा शुभ कर्मों का सम्बन्ध होता है ।