+ वास्तविक अमृत -
अमृतं च विशुद्धिः स्यान्नान्यल्लोकप्रभाषितं ।
अत्यंतसेवने कष्टमन्यस्यास्य परं सुखं ॥16॥
है लोक कल्पित नहीं अमृत, विशुद्धि ही सुधा है ।
उसके अति सेवन से दुख, हो परम सुख इससे कहें ॥१३.१६॥
अन्वयार्थ : संसार में लोग अमृत जिसको कहकर पुकारते हैं अथवा जिस किसी पदार्थ को लोग अमृत बतलाते हैं, वह पदार्थ वास्तव में अमृत नहीं है । वास्तविक अमृत तो विशुद्धि ही है; क्योंकि लोक-कथित अमृत के अधिक सेवन करने से तो कष्ट भोगना पड़ता है और विशुद्धिरूपी अमृत के अधिक सेवन करने से परम सुख ही मिलता है; किसी प्रकार का भी कष्ट नहीं भोगता पड़ता; इसलिए जिससे सब अवस्थाओं में सुख मिले, वही अमृत सच्चा है ।