
विशुद्धिसेवनासक्ता वसंति गिरिगह्वरे ।
विमुच्यानुपमं राज्यं खसुखानि धनानि च ॥17॥
सब छोड़ अनुपम राज्य धन, इन्द्रिय विषय सुख नित रहें ।
गिरि गुफा आदि में सदा, सुविशुद्धि सेवनासक्त हैं ॥१३.१७॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, विशुद्धता के भक्त हैं, अपने आत्मा को विशुद्ध बनाना चाहते हैं; वे उसकी सिद्धि के लिए पर्वत की गुफाओं में निवास करते हैं तथा अनुपम राज्य, इन्द्रिय-सुख और सम्पत्ति का सर्वथा त्याग कर देते हैं । राज्य आदि की ओर जरा भी चित्त को भटकने नहीं देते ।