+ विशुद्धि को प्रगट करने की प्रेरणा -
विशुद्धिः परमो धर्मः पुंसि सैव सुखाकरः ।
परमाचरण सैव मुक्तेः पंथाश्च सैव हि ॥19॥
तस्मात् सैव विधातव्या प्रयत्नेन मनीषिणा ।
प्रतिक्षणं मुनीशेन शुद्धचिद्रूपचिंतनात् ॥20॥
है विशुद्धि उत्तम धरम, वह ही सुखाकर जीव को ।
है वही उत्तम आचरण, है मोक्षमार्ग वही सुनो ॥१३.१९॥
इससे सदा ही यत्न पूर्वक, मनीषी मुनिवरों को ।
'मैं शुद्ध चिद्रूप' चिन्तवन से, प्रतिक्षण कर्तव्य हो ॥१३.२०॥
अन्वयार्थ : यह विशुद्धि ही संसार में परम धर्म है, यही जीवों को सुख का देनेवाला, उत्तम चारित्र और मोक्ष का मार्ग है; इसलिए जो मुनिगण विद्वान हैं, जड़ और चेतन के स्वरूप के वास्तविक जानकार हैं; उन्हें चाहिए कि वे शुद्ध-चिद्रूप के चिन्तन से प्रयत्न पूर्वक विशुद्धि की प्राप्ति करें ।