
यावद्बाह्यांतरान् संगान् न मुंचंति मुनीश्वराः ।
तावदायाति नो तेषां चित्स्वरूपे विशुद्धता ॥21॥
जब तक मुनीश्वर बाह्य अन्त:, परिग्रह नहिं छोड़ते ।
तब तक नहीं आती विशुद्धि, उन्हीं के चिद्रूप में ॥३१.२१॥
अन्वयार्थ : जब तक मुनि-गण बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रह का नाश नहीं कर देते; तब तक उनके चिद्रूप में विशुद्धपना नहीं आ सकता ।