
विशुद्धिनावमेवात्र श्रयंतु भवसागरे ।
मज्जंतो निखिला भव्या बहुना भाषितेन किं ॥22॥
इस भवोदधि में डूबते, सब भव्य आश्रय लो इसी ।
सुविशुद्धि रूपी नाव का, बहु कथन से क्या? एक ही ॥१३.२२॥
अन्वयार्थ : ग्रन्थकार कहते हैं कि इस विषय में विशेष कहने से क्या प्रयोजन? प्रिय भव्यों! अनादि काल से आप लोग इस संसाररूपी सागर में गोता खा रहे हैं, अब आप इस विशुद्धिरूपी नौका का आश्रय लेकर संसार से पार होने के लिए पूर्ण उद्यम कीजिए ।