
नीहाराहारपानं खमदनविजयं स्वापमौनासनं च
यानं शीलं तपांसि व्रतमपि कलयन्नागमं संयमं च ।
दानं गानं जिनानां नुतिनतिजपनं मंदिरं चाभिषेकं
यात्रार्चे मूर्तिमेवं कलयति सुमतिः शुद्धचिद्रूपकोऽहं ॥1॥
नीहार भोजन पान इंद्रिय, कामजय निद्रा गमन ।
प्रणाम आसन मौन आगम, शील तप व्रत संयम ॥
अभिषेक जिन स्तुति पूजन, दान गान सु जाप जिन ।
मूर्ति जिनालय तीर्थ यात्रा आदि में भाओ सुचित् ॥१४.१॥
अन्वयार्थ : बुद्धिमान पुरुष नीहार , खाना, पीना, इंद्रिय और काम का विजय, सोना, मौन, आसन, गमन, शील, तप, व्रत, आगम, संयम, दान, गान, जिनेन्द्र भगवान की स्तुति, प्रणाम, जप, मन्दिर, अभिषेक, तीर्थ-यात्रा, पूजन और प्रतिमाओं के निर्माण आदि करते 'मैं शुद्ध-चिद्रूप स्वरूप हूँ' ऐसा भाते हैं ।