
कुर्वन् यात्रार्चनाद्यं खजयजपतपोऽध्यापनं साधुसेवां
दानौघान्योपकारं यमनियमधरं स्वापशीलं दधानः ।
उद्भीभावं च मौनं व्रतसमितिततिं पालयन् संयमौघं
चिद्रूपध्यानरक्तो भवति च शिवभाग् नापरः स्वर्गभाक् च ॥2॥
करते यजन यात्रादि इंद्रिय-विजय जप तप अरु पठन ।
पाठन गुरु सेवा नियम यम, शील संयम मौन व्रत ॥
समिति विविध उपकार निर्भय, दान आदि सभी में ।
चिद्रूप ध्यानी मोक्षगामी, अन्य जाएं स्वर्ग में ॥१४.२॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य तीर्थ-यात्रा, भगवान की पूजन, इंद्रियों का जय, जप, तप, अध्यापन , साधुओं की सेवा, दान, अन्य का उपकार, यम, नियम, शील, भय का अभाव, मौन, व्रत और समिति का पालन एवं संयम का आचरण करता हुआ शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान में रत है, उसे तो मोक्ष की प्राप्ति होती है और उससे अन्य अर्थात् जो शुद्ध-चिद्रूप का ध्यान न कर तीर्थ-यात्रा आदि को ही करनेवाला है, उसे नियम से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।