
चित्तं निधाय चिद्रूपे कुर्याद् वागंगचेष्टितं ।
सुधीर्निरंतरं कुंभे यथा पानीयहारिणी ॥3॥
पनिहारिणी घटवत् करें, तन वचन चेष्टा चित्त को ।
कर लीन शुद्ध चिद्रूप में, नित विज्ञ चाहो मोक्ष को ॥१४.३॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य विद्वान हैं, संसार के संताप से रहित होना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे घड़े में पनिहारी के समान शुद्ध-चिद्रूप में अपना चित्त स्थिर कर वचन और शरीर की चेष्टा करें ।