
वैराग्यं त्रिविधं प्राप्य संगं हित्वा द्विधा ततः ।
तत्त्वविद्गुरुमाश्रित्य ततः स्वीकृत्य संयमं ॥4॥
अधीत्य सर्वशास्त्राणि निर्जने निरुपद्रवे ।
स्थाने स्थित्वा विमुच्यान्यचिंतां धृत्वा शुभासनं ॥5॥
पदस्थादिकमभ्यस्य कृत्वा साम्यावलंबनं ।
मानसं निश्चलीकृत्य स्वं चिद्रूपं स्मरंति ये ॥6॥
पापानि प्रलयं यांति तेषामभ्युदयप्रदः ।
धर्मो विवर्द्धते मुक्तिप्रदो धर्मश्च जायते ॥7॥
वैराग्य पा मन वचन तन से, छोड़ दोनों परिग्रह ।
तत्त्वज्ञ सद्गुरु शरण ले, अब संयमादि कर ग्रहण ॥१४.४॥
सब शास्त्र पढ़ निर्विघ्न, निर्जन थल निवास करे सदा ।
सब अन्य चिन्ता छोड़, शुभ आसन लगा पदस्थादि का ॥
अभ्यास कर ले साम्य आलम्बन करे चित निश्चली ।
निज शुद्ध चिद्रूप स्मरण ध्यानादि करते हैं यही ॥१४.५-६॥
सब पाप उनके नष्ट, नित कल्याण प्रद सद्धर्म की ।
वृद्धि सदा नित धर्म होता, मोक्षदायी भी यही ॥१४.७॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव मन से, वचन से और काय से वैराग्य को प्राप्त होकर, बाह्य-अभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रहों को छोड़कर, तत्त्ववेत्ता गुरु का आश्रय और संयम को स्वीकार कर, समस्त शास्त्रों के अध्ययन पूर्वक निर्जन निरुपद्रव स्थान में रहते हैं और वहाँ समस्त प्रकार की चिन्ताओं का त्याग, शुभ आसन का धारण; पदस्थ, पिण्डस्थ आदि ध्यानों का अवलम्बन, समता का आश्रय और मन का निश्चलपना धारण कर शुद्ध-चिद्रूप का स्मरण ध्यान करते हैं, उनके समस्त पाप जड़ से नष्ट हो जाते हैं, नाना प्रकार के कल्याणों को करनेवाले धर्म की वृद्धि होती है और उससे उन्हें मोक्ष मिलता है ।