+ चिद्रूप के चिन्तन से सभी पाप नष्ट -
वार्वाताग्न्यमृतोषवज्रगरुडज्ञानौषधेभारिणा
सूर्येण प्रियभाषितेन च यथा यांति क्षणेन क्षयं ।
अग्न्यब्दागविषं मलागफ णिनोऽज्ञानं गदेभव्रजाः
रात्रिवर्रैमिहावनावघचयश्चिद्रूपसंचिंतया ॥8॥
ज्यों जल अनल का अनिल घन का, आग तरु का सुधा विष ।
का क्षार मैल का बज्र गिरि का, गरुड़ अहि का रवी निश ॥
का सिंह गज का रोग का औषध मधुर भाषण करे ।
सब बैर का अज्ञान का नित ज्ञान क्षण में क्षय करे ॥
इत्यादि बहुविध वस्तुएं, बलवान हो ज्यों क्षय करें ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप चिन्तनादि, सकल अघ का क्षय करें ॥१४.८॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार जल अग्नि का क्षय करता है, पवन मेघ का, अग्नि वृक्ष का, अमृत विष का, खार मैल का, बज्र पर्वत का, गरुड़ सर्प का, ज्ञान अज्ञान का, औषध रोग का, सिंह हाथियों का, सूर्य रात्रि का और प्रिय भाषण बैर का नाश करता है; उसी प्रकार शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन करने से समस्त पापों का नाश होता है ।