
वर्द्धंते च यथा मेघात्पूर्वं जाता महीरुहाः ।
तथा चिद्रूपसद्धयानात् धर्मश्चाभ्युदयप्रदः ॥9॥
ज्यों लगे तरुवर मेघ वर्षा से बड़ें त्यों धर्म भी ।
चिद्रूप के सद्ध्यान से, नित बड़े हितकारक सभी ॥१४.९॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार पहले से उगे हुए वृक्ष, मेघ के जल से वृद्धि को प्राप्त होते हैं; उसी प्रकार शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान से धर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता है और नाना प्रकार के कल्याणों को प्रदान करता है ।