यथा बलाहकवृष्टेर्जायंते हरितांकुराः ।
तथा मुक्तिप्रदो धर्मः शुद्धचिद्रूपचिंतनात् ॥10॥
ज्यों मेघ वर्षा से उगें, नित हरे अंकुर त्यों सदा ।
मैं शुद्ध चिद्रूप चिन्तनादि से धरम हो मुक्तिदा ॥१४.१०॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मेघ से भूमि के अन्दर हरे-हरे अंकुर उत्पन्न होते हैं; उसी प्रकार शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन करने से मुक्ति प्रदान करनेवाला धर्म भी उत्पन्न होता है; अर्थात् शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान से अनुपम धर्म की प्राप्ति होती है और उसकी सहायता से जीव मोक्षसुख का अनुभव करते हैं ।