+ मोक्ष-प्राप्ति की पात्रता -
व्रतानि शास्त्राणि तपांसि निर्जने निवासमंतर्बहिः संगमोचनं ।
मौनं क्षमातापनयोगधारणं चिश्चिंतयामा कलयन् शिवं श्रयेत् ॥11॥
व्रत पठन तप निर्जन निवासी, सब परिग्रह छोड़ता ।
आतापनादि योग धारे, क्षमा मौनादि सदा ॥
मैं शुद्ध चिद्रूप चिन्तनादि से सुध्याता आत्म का ।
चिन्मय सुथिर निष्काम वह, नित मोक्ष वैभव ले सदा ॥१४.११॥
अन्वयार्थ : जो विद्वान पुरुष शुद्ध-चिद्रूप के चिन्तन के साथ व्रतों का आचरण करता है; शास्त्रों का स्वाध्याय, तप का आराधन, निर्जन वन में निवास, बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह का त्याग; मौन, क्षमा और आतापन योग धारण करता है, उसे ही मोक्ष-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।