
शुद्धचिद्रूपके रक्तः शरीरादिपराङ्मुखः ।
राज्यं कुर्वन्न बंधेत कर्मणा भरतो यथा ॥12॥
निज शुद्ध चिद्रूपी निरत, तन आदि में ममता-रहित ।
वह राज्य करते भी नहीं बाँधें करम ज्यों थे भरत ॥१४.१२॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष शरीर, स्त्री, पुत्र आदि से ममत्व छोड़कर शुद्ध-चिद्रूप में अनुराग करनेवाला है, वह राज्य करता हुआ भी कर्मों से नहीं बँधता; जैसे कि चक्रवर्ती राजा भरत ।