स्मरन् स्वशुद्धचिद्रूपं कुर्यात्कार्यशतान्यपि ।
तथापि न हि बध्यते धीमानशुभक र्मणा ॥13॥
निज शुद्ध चिद्रूप स्मरण, करता अनेकों कार्य भी ।
पर नहीं बँधता अशुभ कर्मों से विरक्त सदा सुधी ॥१४.१३॥
अन्वयार्थ : आत्मिक शुद्ध-चिद्रूप का स्मरण करता हुआ बुद्धिमान पुरुष यदि सैकडों भी अन्य कार्य करे; तथापि उसके आत्मा के साथ किसी प्रकार के अशुभ-कर्म का बन्ध नहीं होता ।