+ इसका ही पुन: फल -
रोगेण पीडितो देही यष्टिमुष्टयादिताडितः ।
बद्धो रज्वादिभिर्दुःखी न चिद्रूपं निजं स्मरन् ॥14॥
हो रोग पीड़ित लकड़ी मुट्ठी आदि से ताड़ित वदन ।
हो बँधा रस्सी आदि से, पर दुखी नहिं चिद् स्मरण ॥१४.१४॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य स्व-शुद्ध-चिद्रूप का स्मरण करनेवाला है, चाहे वह कैसे भी रोग से पीड़ित क्यों न हो; लाठी, मुक्कों से ताड़ित और रस्सी आदि से भी बँधा हुआ क्यों न हो; उसे जरा भी क्लेश नहीं होता; अर्थात् वह यह जानकर कि ये सारी व्याधियाँ शरीर में होती हैं, मेरे शुद्ध-चिद्रूप में नहीं और शरीर मुझसे सर्वथा भिन्न है - रंच-मात्र भी दु:ख का अनुभव नहीं करता ।