
बुभुक्षया च शीतेन वातेन च पिपासया ।
आतपेन भवेन्नार्तो निजचिद्रूपचिंतनात् ॥15॥
बहु भूख प्यास पवन बहुत गर्मी सुशीतादि नहीं ।
दे सकें दुख चिद्रूप निज के चिन्तनादि से सुखी ॥१४.१५॥
अन्वयार्थ : आत्मिक शुद्ध-चिद्रूप के चिन्तन से मनुष्य को भूख, ठण्ड, पवन, प्यास और आताप की भी बाधा नहीं होती । ।