हर्षो न जायते स्तुत्या विषादो न स्वनिंदया ।
स्वकीयं शुद्धचिद्रूपमन्वहं स्मरतोंऽगिनः ॥16॥
निज स्तुति से हर्ष नहीं, विषाद निन्दा से नहीं ।
निज शुद्ध चिद्रूप स्मरण, करता रहे माध्यस्थ्य ही ॥१४.१६॥
अन्वयार्थ : जो प्रतिदिन स्वकीय शुद्ध-चिद्रूप का स्मरण ध्यान करता है, उसे दूसरे मनुष्यों से अपनी स्तुति सुनकर हर्ष नहीं होता और निन्दा सुनकर किसी प्रकार का विषाद नहीं होता; निन्दा, स्तुति - दोनों दशा में वह मध्यस्थरूप से रहता है ।