रागद्वेषो न जायेते परद्रव्ये गतागते ।
शुभाशुभेंऽगिनः शुद्धचिद्रूपासक्तचेतसः ॥17॥
पर द्रव्य मिलने बिछुड़ने, शुभ अशुभ में नहिं हों कभी ।
राग द्वेष निज चिद्रूप-रत, आतम सुथिर मध्यस्थ ही ॥१४.१७॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य का चित्त शुद्ध-चिद्रूप में आसक्त है; वह स्त्री, पुत्र आदि परद्रव्य के चले जाने पर द्वेष नहीं करता और उनकी प्राप्ति में अनुरक्त नहीं होता तथा अच्छी-बुरी बातों के प्राप्त हो जाने पर भी उसे किसी प्रकार का राग-द्वेष नहीं होता ।