न संपदि प्रमोदः स्यात् शोको नापदि धीमतां ।
अहो स्वित्सर्वदात्मीयशुद्धचिद्रूपचेतसां ॥18॥
नहिं सम्पदा में हर्ष, शोक नहीं विपत्ती में कभी ।
निज शुद्ध चिद्रूप में मगन मन, सुधी को नित साम्य ही ॥१४.१८॥
अन्वयार्थ : सदा निज शुद्ध-चिद्रूप में मन लगानेवाले बुद्धिमान को संपत्ति के प्राप्त हो जाने पर हर्ष और विपत्ति के आने पर विषाद नहीं होता है । वे सम्पत्ति और विपत्ति को समानरूप से मानते हैं ।