
स्वर्णैरत्नैर्गृहैः स्त्रीसुतरथशिविकाश्वेभमृत्यैरसंख्यै –
र्भूषावस्त्रैः स्रगाद्येर्जनपदनगरैश्चाभरैः सिंहपीठैः ।
छत्रैरस्त्रैर्विचित्रैर्वरतरशयनैर्माजनैर्भोजनैश्च
लब्धैः पांडित्यमुख्यैर्न भवति पुरुषो व्याकुलस्तीव्रमोहात् ॥4॥
पाण्डित्य भोजन स्वर्ण रत्न, नगर चँवर सिंहासन ।
घर सुत तिया रथ पालकी, हय भृत्य भूषण छत्र शयन ॥
सब गाय माला वस्त्र अस्त्र, सुदेश आदि से सतत ।
व्याकुल है तीव्र मोह से, फिर भी फसे इनमें सतत ॥१५.४॥
अन्वयार्थ : यह पुरुष मोह की तीव्रता से आकुलता के कारण-स्वरूप भी स्वर्ण, रत्न, घर, स्त्री, पुत्र, रथ, पालकी, घोड़े, हाथी, भृत्य, भूषण, वस्त्र, माला, देश, नगर, चमर, सिंहासन, छत्र, अस्त्र, शयन, भोजन, विद्वत्ता आदि से व्याकुल नहीं होता ।