
रैगोभार्याः सुताश्वा गृहवसनरथाः क्षेत्रदासीभशिष्याः
कर्पूराभूषणाद्यापणवनशिबिका बंधुमित्रायुधाद्याः ।
मंचा वाप्यादि भृत्यातपहरणखगाः सूर्यपात्रासनाद्याः
दुःखानां हेतवोऽमी कलयति विमतिः सौख्यहेतून् किलैतान् ॥5॥
धन गाय स्त्री सुता घोड़ा, घर कपूर दुकान वन ।
गज वस्त्र रथ खेत शिष्य भाजन, पलंग भूषण बन्धु खग ॥
नित छत्र बावड़ी भृत्य रवि, शस्त्रादि आसन पालकी ।
दासी इत्यादि दु:ख हेतु, हेतु सुख अज्ञ भा यही ॥१५.५॥
अन्वयार्थ : देखो! इस बुद्धि-शून्य जीव की समझदारी! जो धन, गाय, स्त्री, पुत्री, अश्व, घर, वस्त्र, रथ, क्षेत्र, दासी, हाथी, शिष्य, कपूर, आभूषण, दुकान, वन, पालकी, बन्धु, मित्र, आयुध, मांच बावड़ी, भृत्य, छत्र, पक्षी, सूर्य, भाजन, आसन आदि पदार्थ दु:ख के कारण हैं; जिन्हें अपनाने से जरा भी सुख नहीं मिलता है; उन्हें यह सुख के कारण मानता है । अपने मान रात-दिन उनको प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता रहता है ।