+ हितकारी मार्ग-दर्शन -
हंस ! स्मरसि द्रव्याणि पराणि प्रत्यहं यथा ।
तथा चेत् शुद्धचिद्रूपं मुक्तिः किं ते न हस्तगा ॥6॥
हे आत्मन! ज्यों प्रति समय, पर द्रव्य याद करे सभी ।
त्यों करे शुद्ध चिद्रूप चिन्तन, ध्यान तो फिर मुक्ति ही ॥१५.६॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! जिस प्रकार प्रतिदिन तु पर-द्रव्यों का स्मरण करते हो; स्त्री, पुत्र आदि को अपना मान उन्हीं की चिन्ता में मग्न रहते हो; उसी प्रकार यदि तु शुद्ध-चिद्रूप का भी स्मरण करो, उसी के ध्यान और चिन्तन में अपना समय व्यतीत करो तो क्या तुम्हारे लिए मोक्ष समीप न हो जाए? अर्थात् तु बहुत शीघ्र ही मोक्ष-सुख का अनुभव करने लग जाओगे ।