
लोकस्य चात्मनो यत्नं रंजनाय करोति यत् ।
तच्चेन्निराकुलत्वाय तर्हि दूरे न तत्पदं ॥7॥
ज्यों स्वयं पर के मनोरंजन, हेतु यत्न करें सदा ।
त्यों निराकुलता हेतु, यत्न करो तो सौख्य मिले सदा ॥१५.७॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार यह जीव अपने और लोक को रंजायमान करने के लिए प्रतिदिन उपाय करता रहता है; उसी प्रकार यदि निराकुलतामय मोक्ष-सुख की प्राप्ति के लिए उपाय करे तो वह मोक्ष-स्थान उसके लिए जरा भी दूर न रहे; बहुत जल्दी प्राप्त हो जाए ।