
रंजने परिणामः स्याद् विभावो हि चिदात्मनि ।
निराकुले स्वभावः स्यात् तं बिना नास्ति सत्सुखं ॥8॥
नित मनोरंजन भाव विकृत, भाव दुखमय जानना ।
निज निराकुल चिद्रूप भाव, सुखद उसी से सुख सदा ॥१५.८॥
अन्वयार्थ : अपने और पर को रंजायमान करनेवाले चिदात्मा में जो जीव का परिणाम लगता है, वह तो विभाव-परिणाम ही है और निराकुल शुद्ध-चिद्रूप में जो लगता है, वह स्वभाव-परिणाम है तथा इस परिणाम से ही सच्चे सुख की प्राप्ति होती है; उसके बिना कदापि सच्चा सुख नहीं मिल सकता ।