+ संसार मात्र का त्याग करने की प्रेरणा -
संयोगविप्रयोगौ च रागद्वेषौ सुखामुखे ।
तद्भवेऽत्रभवे नित्यं दृश्येते तद्भवं त्यज ॥9॥
नित यहाँ पर भव में भी दिखते, राग द्वेष मिलन गलन ।
सुख दु:ख आदि सदा ही, यों मान भव तज भज स्वयं ॥१५.९॥
अन्वयार्थ : क्या तो यह-भव और क्या पर-भव? दोनों भवों में जीव को संयोग, वियोग, राग-द्वेष और सुख-दु:ख का सामना करना पड़ता है; इसलिए हे आत्मन्! तुम इस संसार का त्याग कर दो ।