शास्त्राद् गुरोः सधर्मादेर्ज्ञानमुत्पाद्य चात्मनः ।
तस्यावलंबनं कृत्वा तिष्ठ मुंचान्यसंगतिं ॥10॥
नित शास्त्र गुरु साधर्मि आदि से निजातम ज्ञान कर ।
फिर अन्य संगति छोड़, इसका आश्रय ले मग्न रह ॥१५.१०॥
अन्वयार्थ :
सहेतुक शोक-त्याग की प्रेरणा