+ तत्त्वावलम्बी की प्रवृत्ति -
पुस्तकैर्यत्परिज्ञानं परद्रव्यस्य मे भवेत् ।
तद्धेयं किं न हेयानि तानि तत्त्वावलंबिनः ॥13॥
परद्रव्य का जो ज्ञान शास्त्रों से मुझे है हेय वह ।
निज तत्त्व अवलम्बी को पर सब हेय जानो ही नियत ॥१५.१३॥
अन्वयार्थ : मैं अब तत्त्वावलम्बी हो गया हूँ; अपने और पराए का मुझे पूर्ण ज्ञान हो गया है; इसलिए शास्त्रों से उत्पन्न हुआ पर-द्रव्यों का ज्ञान भी जब मेरे लिए हेय/त्यागने-योग्य है; तब उन पर-द्रव्यों के ग्रहण का त्याग तो अवश्य ही होना चाहिए; उनकी ओर झाँककर भी मुझे नहीं देखना चाहिए ।