+ शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति बिना कृतकृत्यता नहीं -
स्वर्णैरत्नैः कलत्रैः सुतगृहवसनैर्भूषणैं राज्यखार्थे —
र्गोहस्त्यश्वैश्च पद्गैः स्थवरशिविकामित्रमिष्टान्नपानैः ।
चिंतारत्नैर्निधानैः सुरतरुनिवहैः कामधेन्वा हि शुद्ध-
चिद्रूपाप्तिं विनांगी न भवति कृतकृत्यः कदा क्वापि काऽपि ॥14॥
सुत घर वसन भूषण तिया, गो गज सुवर्ण राज हय ।
सेना पदाति पालकी रथ, रत्न मित्र ख-विषय ॥
उत्कृष्ट भोग मिष्ठान्न भोजन, पान चिन्तामणि रतन ।
सुरतरु सुरधेनु विविध, निधिआँ सु वस्तु अनगिनत ॥
इत्यादि बहु-विध भोग्य कोई, कहिं कभी नहिं तृप्ति-कर ।
निज शुद्ध चिद्रूप प्राप्ति से, होते सभी नित कृत्य-कृत ॥१५.१४॥
अन्वयार्थ : कोई भी प्राणी क्यों न हो जब तक उसे शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति नहीं होती; तब तक चाहे उसके पास स्वर्ण, रत्न, स्त्री, पुत्र, घर, वस्त्र, भूषण, राज्य, इंद्रियों के उत्तमोत्तम भोग, गाय, हाथी, अश्व, पदाति-सेना, रथ, पालकी, मित्र, महा-मिष्ट अन्नपान, चिन्तामणि रत्न, खजाने, कल्प-वृक्ष, काम-धेनु आदि अगणित पदार्थ क्यों न मौजूद हों; उनसे वह कहीं, किसी काल में भी कृत-कृत्य नहीं हो सकता ।