
परद्रव्यासनाभ्यासं कुर्वन् योगी निरंतरं ।
कर्मांगादिपरद्रव्यं मुक्त्वा क्षिप्रं शिवी भवेत् ॥15॥
पर द्रव्य तजने का सतत, अभ्यास करता योगि ही ।
तन कर्म सब पर द्रव्य तज, शिव सौख्य पाता शीघ्र ही ॥१५.१५॥
अन्वयार्थ : निरन्तर पर-द्रव्यों के त्याग का चिन्तन करनेवाला योगी शीघ्र ही कर्म और शरीर आदि पर-द्रव्यों से रहित हो जाता है और परमात्मा बन मोक्ष-सुख का अनुभव करने लगता है ।