+ पर-द्रव्य के त्याग की प्रेरणा -
अतः स्वशुद्धचिद्रूपलब्धये तत्त्वविन्मुनिः ।
वपुषा मनसा वाचा परद्रव्यं परित्यजेत् ॥19॥
यों अत: निज शुद्धात्म चिन्मय, प्राप्ति-हेतु तत्त्व-विद ।
मुनि मन वचन तन सभी पर-द्रव्य छोड़ ध्याते स्वयं नित ॥१५.१९॥
अन्वयार्थ : इसलिए जो मुनिगण भले प्रकार तत्त्वों के जानकार हैं, स्व और पर का भेद पूर्णरूप से जानते हैं; वे विशुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति के लिए मन, वचन और काय से पर-द्रव्य का सर्वथा त्याग कर देते हैं, उनमें जरा भी ममत्व नहीं करते ।