
दिक्चेलैको हस्तपात्रो निरीहः
साम्यारूढस्तत्त्ववेदी तपस्वी ।
मौनी कर्मौधेभसिंहो विवेकी
सिद्धयै स्यात्स्वे चित्स्वरूपेऽभिरक्तः ॥20॥
जो हैं दिगम्बर, हस्तपात्राहारि निर्वांछक सदा ।
मौनी तपस्वी साम्यमय, कर्मौघ-गज को सिंह सदा ॥
वे विवेकी नित शुद्ध चिद्रूप लीन अपने में निरत ।
पाते सदा सिद्धि वही, ईश्वर सु स्वस्थमई सतत ॥१५.२०॥
अन्वयार्थ : जो मुनि दिगम्बर, पाणि-पात्रवाले, समस्त प्रकार की इच्छाओं से रहित, समता के अवलम्बी, तत्त्वों के वेत्ता, तपस्वी, मौनी, कर्मरूपी हाथियों का विदारण करने में सिंह, विवेकी और शुद्ध-चिद्रूप में लीन हैं; वे ही परमात्म-पद प्राप्त करते हैं; वे ही ईश्वर कहे जाते हैं; अन्य नहीं ।