+ निर्जन-स्थान किस-किस का साधन है -
सद्बुद्धैः पररंजनाकुलविधित्यागस्य साम्यस्य च
ग्रंथार्थग्रहणस्य मानसवचोरोधस्य बाधाहतेः ।
रागादित्यजनस्य काव्यजमतेश्वेतोविशुद्धेरपि
हेतु स्वोत्थसुखस्य निर्जनमहो ध्यानस्य वा स्थानकं ॥1॥
सद्ज्ञान पर रंजन निराकुल, साम्य शास्त्रार्थ ग्रहण ।
मन वचन रोध सुनष्ट बाधा, राग द्वेषादि त्यजन ॥
हो काव्य में एकाग्र-धी, मन विशुद्धि स्वाधीन सुख ।
निज ध्यान आदि के लिए, सब कहें निर्जन योग्य थल ॥१६.१॥
अन्वयार्थ : उत्तम-ज्ञान, पर को रंजायमान करने में आकुलता का त्याग, समता, शास्त्रों के अर्थ का ग्रहण, मन और वचन का निरोध, बाधा-विघ्नों का नाश, राग-द्वेष आदि का त्याग, काव्यों में बुद्धि का लगना, मन की निर्मलता, आत्मिक सुख का लाभ और ध्यान, निर्जन एकान्त स्थान का आश्रय करने से ही होता है ।